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सम्पादकीय

अफसोस हम नहीं सुधरेंगे

Publish Date: 02-05-2020 Total Views :121

अफसोस

    न जाने इस शराब ने कितने घरो को उजाड़ा होगा,न जाने कितने घरो के चिराग इस                           शराब से बूझे होंगे,लेकिन अफसोस हम नहीं सुधरेंगे 

लोकडाउन के इस समय मे सरकार शराब ठेके खोलने की अनुमति दे रही है।हालांकि नियम जरूर निर्धारित किए गए है लेकिन उनका कैसे अनुपालन होगा ये बड़ा सवाल हैं।कही ये लापरवाही कोरोना जैसी भयंकर महामारी के संकट की इस घड़ी में कोरोना को गति देने में एक मजबूत कड़ी न साबित हो जाए।हालांकि एक अच्छा मौका था जब हम इस कठिन समय मे दुर्वशनो का परित्याग कर अपनी आने वाली पीढ़ी को कोई सन्देश देते।लेकिन अफसोस की बात ये है कि चन्द मुनाफे की खातिर सरकार और ये हमारा पूरा सिस्टम इस तरह घनघोर अंधेरे की ओर हमे धकेल रहा हैं।हालांकि हमे मालूम है की ये शराब हमे कमजोर कर रही है लेकिन अफसोस हम इसको पीए जा रहे है और जीए जा रहे है कहकर खुश हो रहे हैं।लेकिन हकीकत ये है कि आप जी नहीं रहे अपने आप को मौत की ओर लेकर जा रहे हैं।जब देश में एक ओर रोजी रोटी का संकट है गरीब मजदूर,असहाय,निर्धन लोग दर दर भटकने को मजबूर है।ऐसे वक्त में आपका शराब से त्याग एक बड़ा कदम हो सकता है।लेकिन सरकारों को मुनाफा कमाना है आज कोरोना से जंग लड़कर मौत को दूर भगाने के तमाम स्लोगन आप पढ़ रहे होंगे लेकिन ये शराब आपको कहा लेकर जा रही है जरा विचार करों।तमाम दुहाई दी जाएंगी तमाम तर्क वितर्क किए जा सकते है लेकिन ये तय है ये मुनाफा आपकी मौत के सौदे से हैं।विचार आपको करना है दुनिया मे तमाम खाने की चीजें है जिससे आपको आपके परिवार को खाकर लाभ मिलेगा शरीर स्वस्थ रहेगा।लोकडाउन जैसे इस कठोर समय मे जरा चिंतन करो कि अभी तक कितना जीवन जी लिया है इस शराब को पीकर ओर कितना जीवन बाकी है जो पीकर गुजारना हैं।अभी तक जितनी पी हैं उसको पीकर क्या लाभ हुआ है और यदि आगे भी पीते रहोगे तो क्या नुकसान होगा जिसके आकलन आप खुद अभी तक कि पी हुई शराब से लगा सकते हैं।

जरा सोचो उन मासूम बीवी बच्चो के बारे में जो आपके दिए कष्ट को सहते है।इस लेख के जरिए मेरी कोशिश है कि शराब जैसी बुरी लत का त्याग कर उतने रुपए का पूरे परिवार को दूध,फल आदि खिलाए पिलाए अपने आप भी स्वस्थ रहे और अपने परिवार को भी स्वस्थ रखे।