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सम्पादकीय

नारी शक्ति का ये केसा सम्मान

Publish Date: 22-04-2017 Total Views :64

नारी

सदियों से होता यही आया है कि गृहस्थी चलाने के लिए, वंशवृध्दि के लिए, भोगने के लिए स्त्री को इस्तेमाल किया जाता रहा। बदले में उसे यह भी याद दिलाया जाता रहा कि यह सब करना तुम्हारी जिम्मेदारी है, कर्तव्य है, बदले में तुम्हें पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, मानसिक सुरक्षा मिलती रहेगी। स्त्री-पुरुष के बीच समाज में यह अघोषित करार हो गया और स्त्री की इच्छा जाने बगैर उस पर थोप दिया गया। वह चाहे न चाहे, उसे इन जिम्मेदारियों का निर्वाह करना ही होता है। इसके बदले जिस तथाकथित सुरक्षा का दावा था, उसे तो पुरुष समाज ने कब का भुला दिया है। अगर स्त्री को सुरक्षा का एकाध हिस्सा उपलब्ध भी कराया जाता है, तो साथ में अहसान करने का भाव भी लाद दिया जाता है। यही वजह है कि कहींउसे पारिवारिक सुरक्षा मिलती है तो आर्थिक आजादी से वंचित रखा जाता है और अगर वह आर्थिक आजादी प्राप्त करने के लिए घर से बाहर कदम रखती है तो समाज उसे सुरक्षा देने से पीछे हट जाता है। मानसिक रूप से स्त्री चाहे जितनी मजबूत हो, उसकी शारीरिक संरचना के आधार पर भेदभाव कर, यह साबित करने की साजिश निरंतर जारी है कि तुम कमजोर हो। उस पर अत्याचार कर चेतावनी दी जाती है कि शक्तिशाली बनने की कोशिश भी मत करना। स्त्री हो, तो पांच पतियों में बंटने के लिए तैयार रहो, भले उनमें से एक भी भरी सभा में तुम्हारा चीरहरण होने से रोकने की हिम्मत न दिखा सके, उसके लिए किसी दैवीय शक्ति को ही आना होगा। स्त्री हो, तो तुम्हारी सीमा तय करने का हक लक्ष्मण के पास होगा और उसे लांघने की जुर्रत की, तो सीधे रावण के हाथ लगोगी। रावण को सीमा में रहने की हिदायत दी जाए, ऐसी परंपरा नहींहै। स्त्री हो, तो किसी पुरुष पर मोहित होने की सोचना भी नहीं, वर्ना तुम्हारी नाक काट ली जाएगी। स्त्री हो, और अगर तुम्हारी चुनरी में दाग लगता है, तो यह तुम्हारे सोचने की बात है कि तुम उसे कैसे छिपाओ, जिनके कारण दाग लगा, वे तो बेफिक्र हैं और रहेंगे। समाज उनसे प्रश्न नहींकरेगा, तुम में ही दोष ढूंढेगा। हमारी सामाजिक संरचना, परंपरा, मानसिकता ही ऐसी है। तब भी जब बलात्कार के घिनौने प्रकरण होते हैं, तो इस तरह हाय-तौबा मचने लगती है मानो ऐसा अपराध अब तक हुआ ही नहीं और अब ऐसा विरोध होगा कि आगे कभी होगा भी नहीं। जब दिल्ली में निर्भया कांड हुआ, तब आक्रोशित लोगों का हुजूम सड़कों पर उतर आया, संसद तक में इस पर सवाल उठे, कई दिनों तक आंदोलन चलता रहा। उसके अपराधियों को आज तक सजा नहींहुई है। उसके बाद कांकेर में हास्टल में बच्चियों के साथ दुष्कर्म हुआ। दिल्ली में एक मासूम के साथ नृशंसता के साथ बलात्कार किया गया। मध्यप्रदेश में स्विस पर्यटक के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, असम देश का ऐसा कौन सा राज्य है, जहां बलात्कार, छेड़छाड़, महिला उत्पीड़न का अपराध नहींहोता। कभी कोई मामला सुर्खियों में आता है, तो चर्चाओं का दौर शुरु हो जाता है कि कैसे इन घटनाओं पर लगाम लगायी जाए। 
आंकड़ों का प्रस्तुतिकरण यह बतलाया जाता है कि हमारा कानून कितना लचर है कि दिन ब दिन ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं। बलात्कार जैसे मामलों में मृत्युदंड की मांग उठने लगी है। इस वक्त मुंबई में महिला फोटोग्राफर व पत्रकार के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म के बाद फिर ऐसी ही चर्चाएं प्रारंभ हो गयी हैं। संसद में कुछ महिला जनप्रतिनिधि ऐसी हैं, जो कड़ा कानून बनाने की मांग कर रही हैं। दूसरी ओर कुछ नेता ऐसे भी हैं, जो अब भी महिला के कपड़े कैसे हों, वाली मानसिकता से ऊपर उठकर सोच नहींपा रहे हैं। इधर आसाराम पर एक नाबालिग बच्ची के साथ दुष्कर्म का आरोप है। उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है। आसाराम को गिरफ्त में तो अब तक लिया नहींजा सका है, लेकिन बचाव में उमा भारती और कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेता अभी से कूद पड़े हैं। खुद आसाराम भी अपनी सफाई देने में लगे हैं। अगर आपने कोई अपराध नहींकिया तो  कैसा डर। यूं भी खुद को भगवान कहते हो, तो साधारण इंसानों से क्या डरना। उस नाबालिग लड़की के परिवार ने हिम्मत दिखाई और एक तथाकथित लेकिन शक्तिशाली संत के खिलाफ आवाज उठायी। उधर मुंबई की पीड़िता ने भी अस्पताल से बयान दिया कि इस उत्पीड़न का यह अर्थ नहींकि जिंदगी खत्म हो जाती है। इनके हौसले को सलाम। बलात्कार इन पर हुआ है, लेकिन उसका कलंक इनके दामन पर नहींसमाज पर लगा है। खुद को सभ्य कहने वाला यह समाज ऐसे हर अपराध के बाद असभ्य कहलाने की दिशा में एक कदम और बढ़ जाता है। अगर सचमुच हम इंसान कहलाना चाहते हैं तो स्त्री-पुरुष की गैरबराबरी दूर कर वास्तविक समानता कायम करनी होगी। स्त्री के प्रति मानसिकता को बदलना होगा। वर्ना अंतत: नुकसान हमारा है।