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नवरात्रों में कन्या पूजन करते समय रखे इन बातो का खास ध्यान

Publish Date: 15-10-2018 Total Views :90

नवरात्रों

चैत्र नवरात्रि शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होते हैं और रामनवमी तक चलती है तो वहीं शारदीय नवरात्र आश्विन माह की शुक्ल प्रतिपदा से लेकर विजयदशमी के दिन तक चलती है. इन्हें महानवरात्रि भी बोला जाता है. दोनों ही नवरात्रों में देवी का पूजन नवदुर्गा के रूप में किया जाता है. दोनों ही नवरात्रों में पूजा विधि लगभग समान रहती है. आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के नवरात्रों के बाद दशहरा यानि विजयदशमी का पर्व आता है. शरद ऋतु के आश्विन माह में आने के कारण इन्हें शारदीय नवरात्रों का नाम दिया गया है. वहीं नवरात्रि में कन्या पूजन का भी अपना एक अलग महत्व होता है.

साल 2018 में शारदीय (आश्विन) नवरात्र व्रत 10 अक्टूबर से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक चलेंगे. नवरात्र में सबसे पहले व्रत का संकल्प लेना चाहिए. क्योंकि लोग अपने सामर्थ्य अनुसार दो, तीन या पूरे नौ के नौ दिन उपवास रखते हैं. इसलिए संकल्प लेते समय उसी प्रकार संकल्प लें जिस प्रकार आपको उपवास रखना है. इसके बाद ही घट स्थापना की प्रक्रिया आरंभ की जाती है. नवरात्रि में मां भगवती के सभी 9 रूपों की पूजा अलग-अलग दिन की जाती है. मान्यता है कि इन नौ दिनों में माता की पूजा अर्चना करने से सुख, शांति, यश, वैभव और मान-सम्मान हासिल होता है.

कन्या पूजन का महत्व

हिंदू धर्म के अनुसार नवरात्रों में कन्या पूजन का विशेष महत्व है. मां भगवती के भक्त अष्टमी या नवमी को कन्याओं की विशेष पूजा करते हैं. 9 कुंवारी कन्याओं को सम्मानित ढंग से बुलाकर उनके पैर धोकर आसन पर बैठा कर भोजन कराकर सबको दक्षिणा और भेंट दी जाती है.

कन्या पूजन के नियम

श्रीमद् देवीभागवत के मुताबिक कन्या पूजन के कुछ नियम भी हैं. इनमें एक साल की कन्या को नहीं बुलाना चाहिए, क्योंकि वह कन्या गंध भोग आदि पदार्थों के स्वाद से बिल्कुल अनजान रहती है. ‘कुमारी’ कन्या वह कहलाती है जो दो वर्ष की हो चुकी हो, तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कल्याणी, पांच वर्ष की रोहिणी, छ वर्ष की कालिका, सात वर्ष की चण्डिका,आठ वर्ष की शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष की कन्या सुभद्रा कहलाती हैं.

इससे ऊपर की उम्र वाली कन्या का पूजन नही करना चाहिए. कुमारियों की विधिवत पूजा करनी चाहिए. फिर खुद प्रसाद ग्रहण कर अपने व्रत को पूरा कर ब्राह्मण को दक्षिणा देनी चाहिए और उनके पैर छूकर विदा करना चाहिए. कन्या पूजन से दरिद्रता का नाश,शत्रुओं का क्षय और धन,आयु की वृद्धि होती है तो वहीं विद्या, विजय, सुख-समृद्धि भी हासिल होती है.

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